कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, उसका विकास शिक्षक की योग्यता पर ही आधारित होता है जितना अधिक सक्षम और योग्य अध्यापक होंगे उतना ही उत्तम शैक्षिक विकास सम्भव हो सकेगा। शिक्षा का उद्देश्य प्राचीन काल में भौतिक सुखों की उपलब्धि न थी। आधुनिक शिक्षा भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए अधिक प्रेरित करती है। परिणामतः समाज में अधिकाधिक सुख प्राप्ति और सुख-संग्रह का संघर्ष खड़ा हो गया है। आधुनिक शिक्षा में दीक्षित व्यक्ति निश्चित अवधि तक ही भोग न कर जीवनपर्यन्त भोगी बना हुआ है। अर्थात शिक्षा अपने उद्देश्यों के सामाजिक नियोजन से दूर है। आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान शिक्षा का पुनर्नियोजन हो तथा इसमें उच्च मूल्यों एवं आदर्शों तथा शैक्षिक उद्देश्यों का समायोजन हो।
शिक्षा ही वह दीपक है जिसके आलोक में व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। आर्थिक विपन्नता और साधनों के अभाव की विवशता दिखाकर सरकारें अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैं। ऐसे में एक ही रास्ता शेष बचता है कि उदारवेत्ता व्यक्ति शिक्षा की ज्योति जन-जन तक पहुँचाने का कार्यभार अपने कन्धों पर उठाये जैसा कि मालवीय जी ने किया था। हमारे महाविद्यालय के संरक्षक माननीय श्री रविशंकर सिंह 'पप्पू जी' ने अपनी दादी (दूजा देवी पत्नी श्री चन्द्रशेखर जी) के सपनों के अनुकूल निहायत पिछड़े इलाके में जहाँ आवागमन सहित सभी साधनों का अभाव था के लोगों में शिक्षा का अलख जगाने का संकल्प लिया। इसी संकल्प के परिणाम स्वरुप यह दूजा देवी स्नातकोत्तर महाविद्यालय अस्तित्व में आया। जिसके संचालन का कार्यभार मेरे कमजोर कन्धों पर दिया गया। अपनी तमाम् अल्पज्ञता के बावजूद हमने ईमानदारी से कर्तव्य पालन का प्रयास किया है। भविष्य में भी इस महाविद्यालय को एक ऐसे विद्यापीठ के रुप में स्थापित करने का हमारा प्रयास होगा कि जिसकी अनुगूंज दूर-दूर तक सुनाई दे और आने वाला इतिहास इस बात का साक्षी बने कि हम लोगों का यह सामूहिक प्रयास दूसरों के लिए भी अनुकरणीय बन सकें।
रवीन्द्र नाथ टैगार ने शिक्षक के अध्ययनशील होने के सम्बन्ध में लिखा है- "कोई अध्यापक अनवरत अध्ययनशील रहे बिना ठीक ढंग से अध्यापन नहीं कर सकता, जिस प्रकार कोई चिराग स्वयं जले बिना दूसरों को प्रकाश नहीं दे सकता।"
श्री अनिरुद्ध सिंह
प्रबन्धक